बाबरी मस्जिद विध्वंस : वो दिन जिसने बदल दी हिन्दुस्तान की राजनीति

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नई दिल्ली : 6 दिसंबर, 1992 को जब हजारों की संख्या में कारसेवक ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो’ के नारे लगा रहे थे और 16वीं सदी की इस मस्जिद को ढहा रहे थे, तब भारत की राजनीती में एक बड़ा बदलाव आया । 1990 के आसपास उभार लेने वाले राम मंदिर आंदोलन का यह सबसे बड़ा परिणाम था जो लोगों ने देखा । इस आंदोलन को संघ परिवार और हिंदूवादी संगठनो ने आगे बढ़ाया था। बीजेपी और वीएचपी के नेता इस पूरे आंदोलन के अगुवा बने | 25 साल बीत गए हैं, लेकिन इस विवादित मसले के बारे में आज भी लोगों की राय बंटी हुई है ।

बीजेपी नेता चंदन मित्रा कहते हैं कि मस्जिद के विध्वंस के बाद भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। आजादी के बाद से ही भारत वैचारिक राष्ट्रवाद की राह पर था, लेकिन इस मसले के बाद देश की राजनीति सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर मुड़ गई। वह कहते हैं कि इससे पहले तक पहचान की राजनीति जाति और छोटे समूहों में ही विभाजित थी। वह कहते हैं, ‘यह एक बड़ी पहचान थी, जो बहुसंख्यक राष्ट्रवाद के तौर पर स्थापित हुई। यह विचार काफी समय से पनप रहा था मगर बाबरी विध्वंस के बाद यह स्थापित हो गया |

जबकि अन्य लोगों की राय है की बाबरी मस्जिद विध्वंस का भारत की राजनीति पर बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ है। यह खासतौर पर चुनावी राजनीति को प्रभावित करने के मकसद से उठाया गया कदम था | बीजेपी कभी-कभार ही इस मुद्दे पर बात करती है, वह भी ध्रुवीकरण के मकसद से। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद भी मानते हैं कि मस्जिद विध्वंस का राजनीति पर बहुत ज्यादा असर नहीं रहा है। वह कहते हैं, ‘यूपी में बीएसपी और एसपी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में मदद मिली है। यदि राजनीति पर मस्जिद विध्वंस का बड़ा असर हुआ होता तो ऐसा संभव न हो पाता।’ प्रसाद कहते हैं कि राम मंदिर मसले से ज्यादा उदारीकरण का राजनीति पर असर रहा है। वह कहते हैं, ‘संविधान और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ दलित वर्ग को मिला है |

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