युवाओं के लिए वर्षों से तरस रहा है चैंपियन धोनी का गांव

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नई दिल्ली:  भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किये गए भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को कौन नहीं जानता। धोनी की लोकप्रियता से हम सब बाखिफ़ हैं। आज के समय में धोनी खेल के मैदान के रिकार्ड्स हो या कमाई के रिकार्ड्स, वे हर जगह बड़े बड़े स्टार्स को मात देते नज़र आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं धोनी के पैतृक गाँव में लोग रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं।

आपको बता दे कि, धोनी का  पैतृक गांव ल्वाली आज मूलभूत सुविधाओं व रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं होने के कारण पलायन की मार झेलने को मजबूर है। स्थिति यह है कि गांव में एक भी युवा नहीं हैं। आबादी में ज्यादातर बुजुर्ग व बच्चे हैं। धोनी का गांव ल्वाली अल्मोड़ा की जैंती तहसील में स्थित है। ग्रामीणों के मुताबिक, वर्ष 2004 में महेंद्र सिंह धोनी आखिरी बार अपने गांव आए थे, तब गांव में बड़ी संख्या में लोग रहते थे।

टीम इंडिया के कूल कॅप्टन कहे जाने वाले धोनी के पैतृक गाँव की आबादी 46 है, जिसमें 13 पुरुष और 33 महिलाएं शामिल हैं। यहां आज तक गाँव को शहर तक जोड़ने वाली सड़क नहीं बनी हैं। ख़बरों के मुताबिक आज से 40 साल पहले धोनी के पिता पान सिंह रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर रांची चले गए थे फिर उसके बाद वे वही रहने लगे। हालांकि धोनी के पिता धार्मिक आयोजनों में गांव में आते हैं।

साल 2007 में भारत को पहला टी-20 विश्वकप और साल 2011 में वनडे वर्ल्डकप का ख़िताब दिलाने वाले धोनी के पैतृक गाँव में अभी तक सड़क नहीं बन पाई है। अस्पताल की भी सुविधा नहीं है। इंटर की पढ़ाई के लिए बच्चों को कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। जंगली जानवरों के आतंक से गांव में कृषि कार्य बंद हो गया है।16 से 45 वर्ष के बीच का व्यक्ति गांव में कोई भी नजर नहीं आता हैं।

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